अध्याय 11 Willpower वाला Method
Society में ये मान लिया गया है कि porn छोड़ना मुश्किल है। पोर्न छोड़ने की advice देने वाली books और forums अक्सर यही बताकर शुरू करते हैं कि ये कितना difficult है। सच्चाई ये है कि ये बेहद आसान है। इस बात पर शक होना normal है, पर पहले इसे समझने की कोशिश करो। अगर तुम्हारा target चार minute में एक kilometer दौड़ना हो, तो वो मुश्किल है - सालों की कड़ी training करनी पड़ेगी, और फिर भी शायद physically possible न हो।
देखो, porn छोड़ने के लिए क्या करना है? बस देखना नहीं है, और ना ही masturbate करना है। कोई तुम्हें force नहीं करता (खुद के अलावा) masturbation के लीये, और खाने-पीने की तरह ये survival के लिए जरूरी भी नहीं है। तो अगर छोड़ना है तो मुश्किल कहां से हो गया? सच बताऊं - है ही नहीं मुश्किल। users खुद ही इसे मुश्किल बना लेते हैं - willpower या ऐसे methods से जो उन्हें लगता है कि वो कुछ sacrifice कर रहे हैं। चलो इन methods को समझते हैं।
कोई plan करके स दलदल में नहीं फंसता। शुरू होता है magazines या websites से, और क्योंकि ज्यादातर content बकवास लगता है (हां, बिल्कुल बकवास), सिवाय एक-दो clip के जो सही लगते हैं, हमें लगता है कि control में हैं, जब चाहें छोड़ सकते हैं। पहले कुछ clips सिर्फ special occasions पर देखते हैं। फिर पता नहीं कब regularly होने लगता है, और देखते-देखते रोज का routine बन जाता है। Porn life का हिस्सा बन जाती है, हर जगह internet connection चाहिए होता है। फिर लगने लगता है कि हमारा हक है - love, sex, orgasm और porn से stress कम करना। ये समझ में नहीं आता कि वही clip और actors अब पहले जैसा kick नहीं देते, और हम ‘गंदी porn’ से बचने की red line से लड़ने लगते हैं, और हम ‘ज्यादा hard’ content से बचने की कोशिश करते हैं। असल में, masturbation और internet porn न तो sex life बेहतर बनाते हैं, न ही stress कम करते हैं। बस दिमाग में ये बैठ जाता है कि इसके बिना life का मजा नहीं आएगा, कोई stress handle नहीं कर पाएंगे।
समझ में आने में time लगता है कि हम फंस चुके हैं, क्योंकि हम खुद को बेवकूफ बनाते रहते हैं कि शौक के लिए देख रहे हैं - ये मानने को तैयार ही नहीं होते कि अब ये जरूरत बन चुकी है। जब तक कुछ नया, shocking या पहले से ज्यादा extreme न हो, तब तक ‘kick’ नहीं मिलती। फिर भी सोचते हैं कि control में है, जब चाहें छोड़ सकते हैं। यही सबसे बड़ा झूठ है। “मुझे तो इसमें मजा भी नहीं आता, चाहूं तो कभी भी छोड़ सकता हूं” लेकिन ‘चाहने’ का वो दिन कभी आता ही नहीं।
असली पता तब चलता है जब पहली बार seriously छोड़ने की सोचता है। पहली कोशिश अक्सर तब होती है जब कोई relationship शुरू हो, और initial dates के बाद लगे कि partner से वो ‘satisfaction नहीं मिल रही’ जो screen पर मिलती है। या फिर जब daily life में health पर असर दिखने लगे।
कारण कुछ भी हो, user हमेशा किसी stressful situation का इंतजार करता है - चाहे health का मामला हो या sex का। जैसे ही रुकता है, दिमाग का छोटा शैतान भूखा होने लगता है। फिर user को dopamine के लिए कुछ चाहिए होता है - चाहे cigarettes, दारू, या फिर उसका favourite - internet porn - और वो भी बस एक click पे। पहले के time में porn छुपाना पड़ता था, अब तो phone में ही है। पर अगर partner या दोस्तों आस-पास हों, तो अपनी virtual दुनिया में नहीं जा सकते, और तब stress और बढ़ जाती है।
अगर user ने कोई research पढ़ी है या online communities देखी हैं, तो उसके दिमाग में खींचतान चलती रहती है - temptation से लड़ना और दूसरी तरफ लगता है कुछ miss हो रहा है। stress दूर करने का जो पुराना तरीका था, वो अब नहीं है। तीन तरफ से लगी पड़ी है। इस torture के बाद आम तौर पर क्या होता है? compromise - “थोड़ा कम कर लूंगा” या “अभी time ठीक नहीं है” या फिर classic dialog “पहले life से tension कम हो जाए, फिर छोड़ूंगा।”, पर जब stress चला जाता है तो छोड़ने का point ही क्या है? और अगली बार सोचेंगे जब फिर कोई नई stress होगी।
सही टाइम कभी आता ही नहीं है। जिंदगी तो और stressful होती जाती है। पहले mummy-papa की छतरी से निकलते हैं, फिर खुद का घर, EMI की टेंशन, बच्चों की जिम्मेदारी, और job में ज्यादा responsibility - सब एक साथ आ जाता है। जितनी जल्दी user extreme content की तरफ बढ़ता है, उतना ज्यादा परेशान होता है और उतना ही ज्यादा लगता है कि porn के बिना जिंदगी impossible है।
असल में ये सब वहम है कि life में stress बढ़ती जाती है। और porn - या कोई ऐसा ही सहारा - इस वहम को और हवा देती है। इस बारे में आगे detail में बात करेंगे, पर इन शुरुआती failures के बाद user इस उम्मीद में रहता है कि एक दिन सुबह जगेगा और porn या masturbation का मन ही नहीं करेगा। ये hope अक्सर दूसरे ex-users की कहानियों से और बढ़ती है, “मैं serious नहीं था जब तक performance की problem नहीं हुई, फिर porn देखने का मन ही नहीं किया और masturbation भी छूट गया।”
खुद को बेवकूफ मत बनाओ। इन सब कहानियों की असलियत पता करो तो निकलेगा कि इतना simple नहीं था। ज्यादातर लोग पहले से मन बना चुके होते हैं छोड़ने का, बस कोई बहाना ढूंढ रहे होते हैं। और जो “एक झटके में” छोड़ने की बात करते हैं, उनके साथ कुछ बड़ा हुआ होता है: या तो partnerड ने पकड़ लिया, या खुद को ऐसी porn category देखते पाया जो अपनी sexual orientation से अलग हो, और कभी सोची नहीं थी, या फिर sexual performance का बड़ा डर लग जाता है। “मैं ऐसा ही हूं।” अपने आप को धोखा देना बंद करो। अपने आप कुछ नहीं होगा, जब तक तुम खुद action नहीं लोगे।
देखते हैं कि willpower वाला method इतना मुश्किल क्यों है। पूरी life हम ऐसे जीते हैं जैसे कुछ पता ही नहीं, बस “कल से पक्का छोड़ दूंगा” का रट लगाए रखते हैं। फिर अचानक कुछ ऐसा होता है कि छोड़ने की ठान लेते हैं। हो सकता है health की टेंशन हो, sexual performance की फिक्र हो या खुद को analyze करते हुए realize हो कि इसमें मजा भी नहीं आ रहा। वजह कुछ भी हो, हम pros और cons की list बनाने लगते हैं। Sex दो तरह का होता है - एक जो touch, smell, आवाज से जुड़ा है, और दूसरा सिर्फ orgasm के लिए। यही समझ हमारा दिमाग खोलती है, और इस फर्क को समझे बिना confusion होता है, जो fail करा देता है। जब दिमाग लगाकर सोचते हैं तो वही समझ आता है जो हमेशा से पता था, एक ही आवाज आती है “बंद कर दो इसे!”
अगर रुकने के फायदे और porn के फायदों की list बनाओ और points दो, तो छोड़ने के points कहीं ज्यादा होंगे देखते रहने से। एक simple सी betting की तरह है - छोड़ने में खोने को कुछ है नहीं, फायदा होने के chances ज्यादा हैं, और नुकसान न होने के chances तो और भी ज्यादा। User को पता है कि छोड़ने से life improve होगी, पर सोच यही रहती है कि कुछ ‘खो’ रहा है, जो उसे कामयाब नहीं होने देती। ये सिर्फ दिमाग का वहम है, पर बहुत strong वहम है। पता नहीं क्यों, पर user को लगता है कि life के अच्छे-बुरे वक्त में ये sessions help करते हैं। छोड़ने की कोशिश शुरू करने से पहले ही, समाज का brainwashing और खुद की addiction का brainwashing मिलकर एक और ज्यादा powerful brainwashing कर देते हैं - कि ‘छोड़ना’ कितना मुश्किल है।
तरह-तरह की कहानियां सुनने को मिलती हैं - कोई कहता है महीनों से छोड़ा हुआ है पर अब भी पागलों की तरह मन करता है, कोई छोड़ के बैठा है पर रोता रहता है कि एक बार और देख लें। कई कहानियां हैं कि लोगों ने महीनों या सालों तक छोड़ा, clear रहे, खुश भी रहे, पर एक ‘झलक’ देखी नहीं कि फिर से फंस गए। Users को ऐसे लोग पता हैं जो इस नशे की आखिरी stage में हैं - खुद को बर्बाद कर रहे हैं, life का मजा भी नहीं ले पा रहे - फिर भी देखते जा रहे हैं। और ज्यादातर users खुद भी ऐसा झेल चुके हौंगे।
तो इस feeling से शुरू करने की बजाय कि “यार, मस्त news है! अब porn की जरूरत ही नहीं पड़ेगी!”, वो ऐसे शुरू करते हैं जैसे कोई आफत आने वाली हो - बिल्कुल Everest चढ़ने जैसा। और दिमाग में बैठा लेते हैं कि एक बार porn के छोटा शैतान ने पकड़ा तो जिंदगी भर नहीं छोड़ेगा। ज्यादातर लोग अपने partner के सामने रोना रोते हैं, “देखो, मैं porn छोड़ने की कोशिश कर रहा हूं। कुछ हफ्तों तक mood off रहेगा, तो please थोड़ा support करना।” बस, शुरू होते ही हार मान ली।
मान लो user कुछ दिन बिना session के गुजार लेता है। उसकी sexual arousals वापस आने लगते है और वो recover करने लगता है। अपनी favorite tube sites नहीं खोली हैं तो normal stimuli भी excite करने लगते हैं जो पहले होना बन्द हो गया था। पर फिर जिन वजहों से छोड़ने का फैसला किया था, वो धीरे-धीरे भूलने लगते है। वैसे ही जैसे speed-breaker पर गाड़ी slow करते हो। थोड़ी देर slow चलोगे, फिर वही रफ्तार।
इस जंग के दूसरी तरफ वो छोटा शैतान है जिसे अभी तक अपनी dose नहीं मिली। कोई physical pain तो नहीं होता - वैसी ही feeling हो जो जुकाम में होती है, physical, न कोइ काम रुकता, न depression होता, हंस के निकाल दोगे। User को बस इतना पता होता है कि उसे अपनी porn की दुनिया में जाना है। छोटा शैतान ये जानता है, और बड़े brainwashing वाले शैतान को जगा देता है। वही इंसान जो कुछ घंटे या दिन पहले quit करने की list बना रहा था, अब दोबारा शुरू करने का बहाना ढूंढने लगता है। फिर क्या, बहाने शुरू:
“यार life बहुत छोटी है, कल बम फट जाए या बस के नीचे आ जाऊं। अब तो बहुत late हो गया। वैसे भी, लोग बोलते हैं, आजकल तो सब चीज़ों addiction होता है।”
“टाइमिंग गलत है।”
“दिवाली के बाद करता, छुट्टियों/exams के बाद करता, life का ये tension खत्म हो जाए फिर।”
“Focus ही नहीं हो रहा, चिड़चिड़ापन आ रहा है, ठीक से काम भी नहीं कर पा रहा।”
“Family-friends सब नाराज हो जाएंगे। सबकी भलाई के लिए फिर से शुरू करना पड़ेगा। मैं तो पक्का sex addict हूं, अब बिना orgasm खुश नहीं रह सकता।”
“बिना sex के कोई जी नहीं सकता।” (भले लोगों की गलत सलाह से, जो ये sex के emotional और physical पहलू में फर्क नहीं समझते).
“मैं जानता था ये होगा, porn के overuse से dopamin का level इतना बढ़ा कि मेरे दिमाग में DeltaFosB ने permanent changes कर दिए हैं। ये changes अब कभी भी reverse नहीं हो सकते।”
इस stage पर user आम तौर पर हार मान लेता है। Browser खोलते ही दिमाग का दोगलापन (schizophrenia) और बढ़ जाता है। एक तरफ तो relief मिलता है क्योंकि दिमाग के छोटा शैतान को dose मिल जाती है; दूसरी तरफ orgasm बेकार होता है और user को समझ नहीं आता कि ये क्यों कीया। इसीलिए user सोचता है कि उसमें willpower की कमी है। पर असल में willpower की कमी नहीं है, उसने बस नई information के हिसाब से अपना decision change किया है और एक rational decision लिया है।
“अगर खुश ही नहीं है तो healthy या rich होने का क्या फायदा?”
कुछ भी नहीं! लंबी और रोते हुए जिंदगी से तो कम जियो पर हंसते हुए जियो। और non-user की life तो पहले से कई गुना मजेदार है। User का दुख withdrawal की वजह से नहीं है - हालांकि शुरू में trigger इससे ही होता है - असली तकलीफ दिमाग में चल रही खींचतान की है, जो doubt और uncertainty से पैदा होती है। क्योंकि user शुरू से ये सोचता है कि वो कुछ miss हो रहा है, कुछ छीन रहा है, और यही एक तरह का stress बन जाता है।
इन्हीं stress वाले moments में दिमाग बोलता है ‘एक झलक मार लेते हें’, और जैसे ही control करते हैं तो और ज्यादा मन करता है। लेकिन क्योंकि रुक चुके हैं, जा नहीं सकते और इससे और depression होता है और trigger फिर से शुरू हो जाता है। छोड़ना और मुश्किल क्यों लगता है? क्योंकि कुछ होने का wait करते रहते हैं। जैसे driving test देने के बाद पता चल जाता है कि pass हुए या fail। Willpower method में objective नहीं होता, ये सोचते हैं? “बस कुछ दिन और रुक जाऊं, फिर अपने आप मन नहीं करेगा।” online forums में देख सकते हैं, addicts अपने streaks या कितने दिन नहीं देखा, इसकी बात करते रहते हैं।
user जो तकलीफ झेलता है वो दिमागी है और uncertainty से पैदा होता है। कोई physical pain नहीं होता, फिर भी इसका असर बहुत strong होता है। अब दुखी और insecure होकर, भूलने की तो बात ही छोड़ो, doubts और fears से भर जाता है।
“ये तड़प कब तक रहेगी?”
“क्या मैं कभी खुश हो पाऊंगा?”
“क्या कभी सुबह बिस्तर से उठने का मन करेगा?”
“आगे चलकर stress से कैसे deal करूंगा?”
User इंतजार करता रहता है कि चीजें बेहतर हों, पर जब तक वो रोता-धोता रहता है, porn की दुनिया और ज्यादा कीमती लगने लगती है। असल में कुछ हो तो रहा होता है पर unconsciously - अगर वो कुछ हफ्ते बिना browser खोले निकाल दे, तो दिमाग के छोटा शैतान की भूख खत्म हो जाती है। लेकिन जैसा पहले बताया, dopamine और opioids के withdrawal के symptoms इतने हल्के होते हैं कि user को पता ही नहीं चलता। इस time पे बहुत लोग सोचते हैं ‘चलो, जीत गए’ और proof के लिए एक बार check कर लेते हैं, और वापस उसी water slide पर फिसल जाते हैं। एक बार dopamine का taste लगा नहीं कि दिमाग से आवाज आती है “और एक बार…” असल में उन्होंने छोड़ दिया था, पर खुद को फिर से फंसा लिया।
बचपन में सब cartoons देखते थे और neuroscience के हिसाब से उनके लिए दिमाग में neural pathways (DeltaFosB) बन गये। अगर किसी बच्चे को cartoons से दूर करना हो, तो तुम ये study करोगे कि क्या वो pathways अभी भी exist करते हैं और बड़ों से पूछोगे कि वो अपने favorite childhood cartoons अब क्यों नहीं देखतेे। एक तो better entertainment available है और दूसरा, cartoons में वो पुराना मजा नहीं रहा। Willpower method में तुम बस बच्चे को cartoon देखने से जबरदस्ती रोक रहे हो। लेकिन EasyPeasy में तुम उसे समझा रहे हो कि उसे इसमें कोई value न दिखे। बताओ, कौन सा तरीका बेहतर है?
User आम तौर पर तुरंत दूसरा session नहीं करता, सोचता है “मैं फिर से नहीं फंसना चाहता!” और कुछ घंटों, दिनों या हफ्तों का safe period निकाल देता है। फिर ex-user सोचता है, “देखा, मैं फंसा तो नहीं, तो एक और session safe है।” वो उसी trap में फिर से फंस जाता है जिससे शुरुआत हुई थी और water slide पर फिसलना शुरू हो जाता है।
जो लोग willpower method से quit करते हैं, उनको रास्ता बहुत difficult लगता है। असल में main problem brainwashing का है। Physical addiction तो खत्म हो जाती है, पर इंसान फिर भी दुखी रहता है, उदास रहता है। इतनी मुश्किल से गुज़रने के बाद धीरे-धीरे समझ में आता है की अब वापस नहीं जाना। फिर वो रोना-धोना बंद होता है और life porn के बिना भी अच्छी लगने लगती है। लेकिन problem ये है की success rate काफी कम है। क्योंकि जो लोग quit कर भी लेते हैं, वो vulnerable position में रहते हैं। उनके mind में कहीं न कहीं ये thought रहता है की porn से उनको कुछ benefit मिलता है। इसी वजह से बहुत से users जो महीनों या सालों तक clean रहते हैं, वो भी वापस शुरू कर देते हैं।
बहुत से ex-users कभी-कभी एक session को ‘special treat’ की तरह use करते हैं, या फिर अपने आप को prove करने के लिए की उनका self-control कितना strong है। होता भी है ऐसा - लेकिन जैसे ही session खत्म होता है, dopamine कम होने लगता है और दिमाग के किसी कोने से एक छोटी आवाज़ दोबारा देखने के लिए push करने लगती है। अगर वो फिर देखने का decision ले लेते हैं, तो उन्हें लगता है सब control में है। कोई shock नहीं, कोई escalation नहीं, न ही नई चीज़ों की तलाश। तो वो सोचते हैं, “वाह! हालाँकि वास्तव में मज़ा तो नहीं आ रहा, लेकिन मैं addict नहीं होऊंगा। दिवाली के बाद / इस holiday के बाद / इस problem के खत्म होने के बाद, मैं बंद कर दूंगा। उन्हें नहीं पता की उनके दिमाग की water slides और भी ज्यादा slippery हो चुकी हैं।”
तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, वो फिर से फंस चुके होते हैं! जिस trap से बड़ी मुश्किल से निकले थे, उसने फिर से अपना शिकार पकड़ लिया।
और बात enjoyment की भी नहीं है। कभी थी ही नहीं! अगर सच में enjoyment के लिए देखते होते, तो कोई भी tube sites पर सीधे orgasm करता और फिर ज्यादा time नहीं बिताता। सच्चाई ये है की self-pleasure के लिए अपनी memories बेहतर option हैं। हम सोचते हैं की हमें porn से enjoyment मिलता है क्योंकि हमें लगता है की हम इतने बेवकूफ नहीं हैं की बिना मज़े के किसी चीज़ के addict हो जाएं। ज्यादातर users को supernormal stimulus, novelty या shock-seeking के बारे में पता ही नहीं होता। और जब पता भी चलता है, तो वो मानने को तैयार नहीं होते की उनका brain का reward-circuit इसके पीछे है। इसीलिए porn का ज्यादातर असर subconscious level पर होता है। अगर आपको neurological changes का पता हो और सोचना पड़े की भविष्य में इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ेगी, तो enjoyment का वो झूठा भ्रम भी खत्म हो जाएगा।
जब हम बुरी बातों को ignore करने की कोशिश करते हैं, तो खुद को बेवकूफ महसूस करते हैं। अगर सच्चाई का सामना करना पड़े, तो बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाएगा! किसी user को देख लो use करते वक्त - वो सिर्फ तभी खुश दिखता है जब उसे अपने action का होश नहीं होता। जैसे ही awareness आती है, वो uncomfortable हो जाता है और guilty feel करने लगता है। Porn असल में छोटे शैतान (physical craving) को feed करता है। जब आप इसे अपने system से निकाल देते हैं और साथ में brainwashing (बड़ा शैतान) भी खत्म कर देते हैं, तो फिर न तो जरूरत रहेगी और न ही देखने की इच्छा!